इस समय हमारी जिंदगी की जंग एक ऐसे अनजान फैक्टर से हो रही है जिसे हम पहचान भी नहीं पा रहे, जिससे हम भयभीत भी है और उससे जीतना भी चाहते हैं. पर सब कुछ बहुत दुरूह लग रहा है. कारण कि जिन मूल्यों, जीवन शैलियों और सुविधाओ के हम आदी हैं यह जंग उन सब को चुनौती है. हमें अपनी उन्नति, अपनी बुध्धि, मानव होने के दंभ, जिसे हम उन्नति कहते है उस पर प्रश्नचिन्हों सभी से जूझना पड रहा है. साफ़ दिख रहा है की इन मुद्दों को सुलझाये बिना हमारा अस्तित्व मात्र, जीवन जीने की संभावना तक खतरे में पड गयी है. इस चुनौती ने हमें इस कदर निरीह बना दिया है कि घुटने टेक कर जो प्रश्न सामने हैं उनके हल, एक नई जीवन शैली और मूल्यों को अपनाना ही एकमात्र निदान नज़र आ रहा है. सहज नहीं ऐसा करना पर करना पड़ेगा अन्यथा...
मानव जाति के विनाश कीप संभावना इस रूप में सामने आएगी ऐसा तो कभी सोचा न था. प्रकृति, इश्वर या इस दुनियां को चलाने वाला जो अल्टीमेट फोर्स है वह हमसे खासा आगे है. उसने मनुष्य को सही रास्ते पर लाने का जो तरीका निकाला है वह, मानना पड़ेगा, विलक्षण, बेमिसाल और बहुत ही मुश्किल है. मरता क्या ना करता वाली स्थिति है. सबसे अजीब बात है कि यह हो रहा है इसके कई प्रमाण हमारे सामने हैं जैसे कि पिछले ३० वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि सहारनपुर से हिमालय पर्वत की बंदरपंच और गंगोत्री की बर्फ ढकी चोटिया स्पस्ट दिखाई देना, गंगा का निर्मल हो जाना, कई समुद्र तटों पर अलभ्य मछलियों का किलोल करना, आसमान में तारे दिखना, प्रदूषण घटना, सड़क पर दुर्घनाये एकदम कम हो जाना, जंगली जानवरों का सुनसान सडकों पर बेफिक्र घूमना, ओजोन परत के छेद का भरना. स्पष्ट है इन सारे दृष्टान्तों में सरल, प्राकृतिक जीवन शैली का गहरा आग्रह है जो ज़रूरत हो चला है . हमें इसके बारे में फ़ौरन कार्यवाही करनी पड़ेगी अन्यथा.... चलिए एक लिस्ट बनाते हैं कौन कौन से क्षेत्र हैं जिनमे परिवर्तन हो सकता है – इंडस्ट्री, यात्रा के साधन,कितनी गाड़ियाँ हो सडकों पर, पर्यावरण, हमारा खाना पीना, हमारे गाँव, गाँव के लोगों की जीविका, हमारी जीवन शैली, और भी अनेक विषय हैं इस लिस्ट के लिए .
हमें एक नया, सारे चराचर, सारे संसार को एक समष्टि, एक यूनिट के रूप में देखने, समझने और जीने का नज़रिया छंटे हैं तो हम प्रकृति के साथ है. यह परिवर्तन हमें हर स्तर पर करना होगा . यह एक अनिवार्यता है, ऑप्शन नहीं.
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