Thursday, May 14, 2020

Fighting the Unknown Enemy

Right now we are battling an enemy we don’t even know  though we are fearful of him, though we know it is deadly and ultimately we do want to defeat it.  It is not easy to fight an unequal battle. Reasons for this go far deep into the human history, into our own life time when we saw so many changes. We are used to living a comfortable life at the cost of so many vital factors. Covid 19 is a challenge to all our parameters of comfort, mechanization, fast traffic and  fast food. Right now, at this moment we have been forced to live a simpler life, a life within the four walls of our homes, a life of pure food, pure air and pure water.  Covid  19 has put a question mark on the modern life style as it is based on exploitation of natural resources like water, air, vegetation , the wildlife. Our pride of being the supreme in the biological chain is in dole drums. Nature is asserting itself by showing that a simpler, equittable life is safer. Just a few months back  Delhi, the capital of our proud country, was becoming an unlivable place . Its air was so polluted. Who did it? The answers are too obvious. The writing on the wall is ‘REDUCE EXPLOITING THE NATURAL RESOURCES unmindfully. 
We had never thought that the possibility of human elimination would come surface this way. One had imagined and forecast end of earth through a massive deluge, water holocaust, world war, even biological warfare.  With all humility we have to admit, nature, God or any force that runs the world has found an ingenious way to teach a lesson to the human race. This time the big nations are not the winners. The most powerful seem to be the most vulnerable. Why is the sky bluer? Why people in Saharanpur could see the snow topped  peaks of himalayas? How is it  that  Ganga flows cleaner? Why animal life is claiming urban spaces? How the ozone layer has healed itself? Why the fatal accidents on our roadshave decreased so fast? Why every city has cleaner air levels? Again the answers are too obvious. There is a tilt towards a simpler life style. There is something which tells us we are a small particle in the frame of things - we are not the masters. Nature seeks co-existence not subjugation of all living resources for the sole benefit of human race.  
We can draw a list. Food, traffic, air, water, the trees, the birds and bees all are there to build a happy order.  Everything has its place in the ecological order. Let us, for once think of a slower world that eats pure, drinks purer water, use automobiles to reach somewhere not  marauding others,  If we humans can do it during the lockout and claim our life back, we have to rethink the concept of progress.  

एक अनजान शत्रु से लड़ाई आसान नहीं

इस समय हमारी जिंदगी की जंग एक ऐसे अनजान फैक्टर से हो रही है जिसे हम पहचान भी नहीं पा रहे, जिससे हम भयभीत भी है और उससे जीतना भी चाहते हैं. पर सब कुछ बहुत दुरूह लग रहा है. कारण कि जिन मूल्यों, जीवन शैलियों और सुविधाओ के हम आदी हैं यह जंग उन सब को चुनौती है. हमें अपनी उन्नति, अपनी बुध्धि, मानव होने के दंभ, जिसे हम उन्नति कहते है उस पर प्रश्नचिन्हों सभी से जूझना पड रहा है. साफ़ दिख रहा है की इन मुद्दों को सुलझाये बिना हमारा अस्तित्व मात्र, जीवन जीने की संभावना तक खतरे में पड गयी है. इस चुनौती ने हमें इस कदर निरीह बना दिया है कि घुटने टेक कर जो प्रश्न सामने हैं उनके हल, एक नई जीवन शैली और मूल्यों को अपनाना ही एकमात्र निदान नज़र आ रहा है. सहज नहीं ऐसा करना पर करना पड़ेगा अन्यथा... 
मानव जाति के विनाश कीप संभावना इस रूप में सामने आएगी ऐसा तो कभी सोचा न था. प्रकृति, इश्वर या इस दुनियां को चलाने वाला जो अल्टीमेट फोर्स है वह हमसे खासा आगे है. उसने मनुष्य को सही रास्ते पर लाने का जो तरीका निकाला है वह, मानना पड़ेगा, विलक्षण, बेमिसाल  और बहुत ही मुश्किल है. मरता क्या ना करता वाली स्थिति है. सबसे अजीब बात है कि यह हो रहा है इसके कई प्रमाण हमारे सामने हैं जैसे कि पिछले ३० वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि सहारनपुर से हिमालय पर्वत की बंदरपंच और गंगोत्री की बर्फ ढकी चोटिया स्पस्ट दिखाई देना, गंगा का निर्मल हो जाना, कई समुद्र तटों पर अलभ्य मछलियों का किलोल करना, आसमान में तारे दिखना, प्रदूषण घटना, सड़क पर दुर्घनाये एकदम कम हो जाना, जंगली जानवरों का सुनसान सडकों पर बेफिक्र घूमना, ओजोन परत के छेद का भरना. स्पष्ट है इन सारे दृष्टान्तों में  सरल, प्राकृतिक जीवन शैली का गहरा आग्रह है जो ज़रूरत हो चला है . हमें इसके बारे में फ़ौरन कार्यवाही करनी पड़ेगी अन्यथा.... चलिए एक लिस्ट बनाते हैं कौन कौन से क्षेत्र हैं जिनमे परिवर्तन हो सकता है – इंडस्ट्री, यात्रा के साधन,कितनी गाड़ियाँ हो सडकों पर, पर्यावरण, हमारा खाना पीना, हमारे गाँव, गाँव के लोगों की जीविका,  हमारी जीवन शैली, और भी अनेक विषय हैं इस लिस्ट के लिए .   
हमें एक नया, सारे चराचर, सारे संसार को एक समष्टि, एक यूनिट के रूप में देखने, समझने और जीने का नज़रिया छंटे हैं तो हम प्रकृति के साथ है. यह परिवर्तन हमें हर स्तर पर करना होगा . यह एक  अनिवार्यता है, ऑप्शन नहीं. 

Monday, May 4, 2020

वैश्विक बाज़ार की अनिवार्यता और प्राकृतिक न्याय

वह पुरानी, सभ्यता से पहले की मनुष्य की जीवन शैली जिसमे हर पेड़ , पौधा, जीव जंतु और मौसम एक ऐसे प्राकृतिक बंधन में बंध कर काम करते थे जो सुप्रीमेसी या फिर बाहुबल पर निर्भर नहीं करता था, इंडस्ट्रियल रेवोलुशन के बाद से बड़ी तेज़ी से तिरोहित होने लगा था. हम, मनुष्य अपनी उच्चता के प्रति अति आश्स्वत हो कर जो भी चाहिए उसे पाने की होड़ में लग गए. किसी हद तक यह अच्छा भी था. उन्नति के एक से बढ़ कर एक सोपान हमने पा लिए. इस दोड में यह चिरंतन सत्य कि हम पूरे प्राकृतिक एको सिस्टम का एक अंग मात्र हैं यह भूल ही गए. यूँ कहें की हमने अपने हर कृत्य को, एटम बम जैसी खोजों  को  भी न्यायोचित मान लिया. भैया, जिसकी लाठी उसकी भैंस!!
जहाँ बहुत सी जनजातियाँ जो जंगल की पैदावार पर ही जीती थी नष्ट हो गयीं, वहीँ जंगल कट गए, नदियाँ सूख गयीं, जानवरों के घर, उनके प्राकृतिक ब्रीडिंग ग्राउंड्स हमारी इंडस्ट्रीज के उपयोग में आने लगे. उपनिवेशवाद (जो ब्रिटिश राज्य में हमने झेला), के भयानक दौर के बाद, औद्योगिग क्रांति ने अमीरी गरीबी का एक नया चक्र चलाया . हमें याद ही नहीं रहा की एक और दुनिया है जो मनुष्य की दुनिया को सपोर्ट करती है- प्रकृति की दुनिया जिसे हमने अपना दास समझ लिया अपने तरीके से हमें समझा रही है. बहुत हो चुका. संभलो. हम नहीं सुन पा रहे थे सूखी नदियों की पुकार, पिघलते हिमखंडों का बहाव, प्रदूषित हवा का दर्द. तो लीजिये एक भयावह सच सामने है. जो प्राकृतिक, सामाजिक संतुलन हम खो बैठे हैं वह वापस आना जीवन जीने की शर्त बन चुका है आज . 
परिवर्तन जीवन के हर क्षेत्र में आएगा चाहे धीरे चाहे जल्दी. यदि इस सच को हम एक एक क्षेत्र से जोड़ कर देखें तो क्या ज़रूरत है हमें इतनी गाड़ियों की, तेज़ रफ़्तार की, ऊँची इमारतों की? इनकी दोड में हमारे देश में सडकों पर  १,५०० लोग हर वर्ष , अपना जीवन खो बैठते हैं. ये त्रासदी एक खबर बन कर जल्दी हमारे ज़ेहन से उतर जाती है. इस एक  महीने में ही मौतों का ये आंकड़ा घट कर .... हो गया है.  हमें अपनी यातायात की पालिसी को फिर से परिभाषित करना ज़रूरी हो चला है. सड़कों के किनारे बसी मजदूरों की बस्तियां, उनका जीना मरना, फूटपाथों पर सोना  और भी न जाने क्या क्या हमें दिखता ही नहीं. अपनी सुविधाओ के चलते हमने आंखे मूँद रखी हैं. ये सब अब दिखने लगेगा. ज़रूरी है. ये सब बदलेगा . तभी निजात है अन्यथा कोविद १९ जैसे मृत्युदूत तो  हैं ही.