Monday, May 4, 2020

वैश्विक बाज़ार की अनिवार्यता और प्राकृतिक न्याय

वह पुरानी, सभ्यता से पहले की मनुष्य की जीवन शैली जिसमे हर पेड़ , पौधा, जीव जंतु और मौसम एक ऐसे प्राकृतिक बंधन में बंध कर काम करते थे जो सुप्रीमेसी या फिर बाहुबल पर निर्भर नहीं करता था, इंडस्ट्रियल रेवोलुशन के बाद से बड़ी तेज़ी से तिरोहित होने लगा था. हम, मनुष्य अपनी उच्चता के प्रति अति आश्स्वत हो कर जो भी चाहिए उसे पाने की होड़ में लग गए. किसी हद तक यह अच्छा भी था. उन्नति के एक से बढ़ कर एक सोपान हमने पा लिए. इस दोड में यह चिरंतन सत्य कि हम पूरे प्राकृतिक एको सिस्टम का एक अंग मात्र हैं यह भूल ही गए. यूँ कहें की हमने अपने हर कृत्य को, एटम बम जैसी खोजों  को  भी न्यायोचित मान लिया. भैया, जिसकी लाठी उसकी भैंस!!
जहाँ बहुत सी जनजातियाँ जो जंगल की पैदावार पर ही जीती थी नष्ट हो गयीं, वहीँ जंगल कट गए, नदियाँ सूख गयीं, जानवरों के घर, उनके प्राकृतिक ब्रीडिंग ग्राउंड्स हमारी इंडस्ट्रीज के उपयोग में आने लगे. उपनिवेशवाद (जो ब्रिटिश राज्य में हमने झेला), के भयानक दौर के बाद, औद्योगिग क्रांति ने अमीरी गरीबी का एक नया चक्र चलाया . हमें याद ही नहीं रहा की एक और दुनिया है जो मनुष्य की दुनिया को सपोर्ट करती है- प्रकृति की दुनिया जिसे हमने अपना दास समझ लिया अपने तरीके से हमें समझा रही है. बहुत हो चुका. संभलो. हम नहीं सुन पा रहे थे सूखी नदियों की पुकार, पिघलते हिमखंडों का बहाव, प्रदूषित हवा का दर्द. तो लीजिये एक भयावह सच सामने है. जो प्राकृतिक, सामाजिक संतुलन हम खो बैठे हैं वह वापस आना जीवन जीने की शर्त बन चुका है आज . 
परिवर्तन जीवन के हर क्षेत्र में आएगा चाहे धीरे चाहे जल्दी. यदि इस सच को हम एक एक क्षेत्र से जोड़ कर देखें तो क्या ज़रूरत है हमें इतनी गाड़ियों की, तेज़ रफ़्तार की, ऊँची इमारतों की? इनकी दोड में हमारे देश में सडकों पर  १,५०० लोग हर वर्ष , अपना जीवन खो बैठते हैं. ये त्रासदी एक खबर बन कर जल्दी हमारे ज़ेहन से उतर जाती है. इस एक  महीने में ही मौतों का ये आंकड़ा घट कर .... हो गया है.  हमें अपनी यातायात की पालिसी को फिर से परिभाषित करना ज़रूरी हो चला है. सड़कों के किनारे बसी मजदूरों की बस्तियां, उनका जीना मरना, फूटपाथों पर सोना  और भी न जाने क्या क्या हमें दिखता ही नहीं. अपनी सुविधाओ के चलते हमने आंखे मूँद रखी हैं. ये सब अब दिखने लगेगा. ज़रूरी है. ये सब बदलेगा . तभी निजात है अन्यथा कोविद १९ जैसे मृत्युदूत तो  हैं ही. 

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